सूरदास का जीवन परिचय, surdas ka jivan parichay

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सूरदास का जीवन परिचय, surdas ka jivan parichay

सूरदास
सूरदास

कृष्ण भक्ति के लिए सबसे प्रसिद्ध कवि सूरदास का वर्णन आपको अनेक जगह मिलेगा लेकिन कुछ खास पंक्तियां जो हमारे द्वारा इस पद में उनका एक अनूठा स्थान प्रदर्शित करती है सूरदास ने अपना जीवन कृष्ण भक्ति में व्यतीत किया सूरदासजी के ग्रंथ तथा साहित्य को देखकर यह माना जाता है कि उनका सबसे बड़ा साहित्य सूर्य है इस साहित्य में मुख्य तीन कृतियों में विभाजित किया गया सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य, लहरी, सूरसागर के कुछ पदों में भागवत की कथा का वर्णन विस्तृत रूप से किया गया है

तथा इसे एक विशेष गीत भ्रमगीत के महत्व के आधार पर पहचाना जाता है

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सूरदास का साहित्यिक परिचय, surdas ka sahityik parichay

सूरदास के व्यक्तित्व का प्रकाशन कुछ इस प्रकार है कि आगरा के निकट ‘सीही’ नामक गांव में हुआ सूर दास का परिवार सारस्वत ब्राह्मण तथा इन की भेंट महाप्रभु वाला चारी से हुई जिन्होंने कृष्ण भक्ति की और मार्गदर्शक किया इस कारण सूरदासजी ने अपना साहित्य परिचय कवि परिचय तथा उसके आधार अनेक रचनाओं का वर्णन किया सूरदासजी के कुछ महान का परिचय आज विश्व भर में प्रसिद्ध है कृष्ण भक्ति में लीन सूरदासजी ने अपना वात्सल्य रस के सम्राट की उपाधि ग्रहण की तथा उनके कहीं महान रचना वनों का विस्तार रूप से वर्णन किया

इस सूरदासजी सद्गुण भक्ति धारा के कृष्ण भक्ति शाखा के कवि कुल शिरोमणि माने गए हैं

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सूरदास का जन्म, surdas ka janm

हिंदी साहित्य में सूरदास के जन्म और मृत्यु को लेकर काफी मतभेद हैं इसीलिए सूरदास के जन्म के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कुछ इतिहासकारों द्वारा सूरदासजी का जन्म रुकता किरोली नामक गांव में 1478 में हुआ था सूरदास जब जन्मे वह अंधे थे लेकिन सूरदासजी अंधे होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी रचनाओं में इस तरह वर्णन किया आज भी लोग उन घटनाओं को देखते हैं तो प्रभावित होते हैं लोगों के मध्य उनके अंधे होने का भी मतभेद है सूरदासजी का जन्म चौरासी वैष्णव की वार्ता के अनुसार रुकता तोरण क्षेत्र के वर्तमान जिला आगरा में हुआ था सूरदासजी का जन्म भावप्रकाश के अनुसार सीही नामक ग्राम में बताया गया है

कुछ लोगों के अनुसार मानना है कि सूरदास का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था

जो आगरा और मथुरा के बीच गांव घाट पर निवास करते हैं सूरदासजी के पिता का नाम रामदास था और वह एक प्रसिद्ध गायक थे सूरदासजी का बचपन गऊ घाट पर बीता कुछ विद्वानों का मानना है

सूरदासजी का निधन पारसोली गांव में सन 1563 ईस्वी में हुआ यह एक अनुमानित तथ्य है

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सूरदास की शिक्षा, surdas ki shiksha

सूरदासजी ने गौ घाट पर ही अपनी शिक्षा प्राप्त की सूरदास जी को गांव घाट पर ही श्री वल्लभाचार्य से मिले उनके बाद में उनके शिष्य बन गए सूरदास जी को बल्ब आचार्य ने पुष्टिमार्ग से दीक्षित कर कृष्ण मार्ग की ओर अग्रसर कर दिया वल्लभाचार्य और उनके शिष्य सूर दास के बारे में एक रोचक बात भी है सूर दास के गुरु बल्ब आचार्य और उनकी आयु में सिर्फ 10 दिन का ही अंतर है

विक्रम सम्वत वैशाख कृष्ण एकादशी को 1534 में बल्लभाचार्य का जन्म हुआ

विक्रम सम्वत वैशाख शुक्ल पंचमी के समक्ष सूरदास का जन्म 1534 में हुआ था

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सूरदास की रचनाएं, surdas ki rachnaye

सूरदासजी द्वारा हिंदी साहित्य में मुख्य रूप से 5 ग्रंथों की रचना की है

1. सूरसागर

यह रचना सूरदास द्वारा प्रसिद्ध रचना है इस रचना में सूरदास द्वारा युक्त सवा लाख पदों का संग्रह होने की बात कहते हैं लेकिन वर्तमान में अब 7 से 8000 पद का अस्तित्व रह गया है

अलग-अलग स्थानों पर इन पदों की 100 से भी ज्यादा प्रति ले बिया प्राप्त हुई है

2. सुरसारावली

लिखित सुरसारावली में कुल 1107 छंद ही उपलब्ध है सूर दास ने इस ग्रंथ कि 67 वर्ष की उम्र में रचना की थी यह पूर्ण ग्रंथ सब व्रत होली के गीत के रूप में ही लिखित है

3. साहित्य लहरी

साहित्य लहरी में 118 पदों कि रचना की गई है इस ग्रंथ की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसके अंतिम पद में सूर दास ने अपने वंश वृक्ष के बारे में बताया है

4. नल दमयंती

कृष्ण भक्ति से अलग एक महाभारत कालीन नल और नल दमयंती की कहानी लिखी जिसमें युधिस्टर अपना सब कुछ झूआ में हार चुका था

तब ऋषि द्वारा नल दमयंती की कहानी युधिस्टर को सुनाई जाती है

5. ब्याहलो

सूरदास द्वारा रचित ब्याहलो ग्रंथ जो नल दमयंती की तरह अपर्याप्त ग्रंथ है जो सूरदासजी का यह ग्रंथ सबसे अलग माना जाता है

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सूरदास की कृष्ण भक्ति, surdas ki krishna bhakti

सूरदास ने वल्लभाचार्य से शिक्षा लेने के बाद वह पूर्णत कृष्ण भक्ति में लीन हो गए सूरदासजी ने अपनी भक्ति को ब्रज भाषा में लिखा था दास द्वारा जितनी भी रचनाएं रची गई वै ब्रज भाषा में उपलब्ध है इसीलिए सूरदास को ब्रजभाषा का महान कवि माना जाता है हिंदी साहित्य के यह बृज भाषा है

जो ब्रज श्रेत्र ने भक्ति काल मैं हीं यह भाषा बोली जाती हैं

इस भाषा में ही रसखान रहीम केशव घनानंद बिहारी इत्यादि सूर दास के अलावा हिंदी साहित्य में योगदान था

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