कबीर दास का जीवन परिचय, kabir das ka jivan parichay

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कबीर दास का जीवन परिचय, kabir das ka jivan parichay

कबीर दास
कबीर दास

राजस्थान कबीर दास का जीवन परिचय (kabir das ka jivan parichay) काशी गांव में कबीर दास का जन्म 1440 में हुआ था कबीर दास एक भक्ति काल एवं हिंदी साहित्य के ज्ञाना सराय शाखा के प्रतिनिधि कवि थे कबीर के वास्तविक माता पिता का नाम नहीं है उनका बचपन से ही पालन पोषण एक दंपत्ति नीरू जिसकी कोई भी संतान नहीं थी और उनकी पत्नी नीमा ने किया था कबीर ने बचपन से ही शिक्षा प्राप्त नहीं की थी वह एक अनपढ़ थे कबीर का आध्यात्मिक चिंतन एवं साधु संगति तथा उनसे प्राप्त निर्गुणा से भक्ति के कारण उनके मन में आत्म ज्ञान का विकास हुआ था

तथा कबीर दास ने समाज में व्याप्त छुआछूत, अंधविश्वास, धार्मिक, आडंबर, महोदय वाद एवं ऊंच-नीच का कड़ा विरोध किया कबीरदास को बाबू समाज सुधारक के नाम से जानते थे कबीर ने अपनी पूर्ण रचनाओं का संकलन एक ग्रंथ जो बीजक नामक से था उन्हें अपनी पूर्ण रचनाओं का अभिवादन किया उससे रत्नों के तीन प्रमुख भाग हैं जो सबद साक्षी और रमैनी इन रचनाओं में संत कबीरदास का काव्य परंपरा में सबसे ऊंचा नाम हैं संत कबीरदास द्वारा सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया था

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कबीर दास का जन्म, kabir das ka janm

कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किवदंती या उपलब्ध है कबीर एक पन्थियों की मान्यता मानी जाती है कि कबीर दास का जन्म एक लहरतारा तालाब मैं एक कमल के पुष्प पर काशी में उनका जन्म हुआ था कुछ का कहना है कि कबीरदास एक मुस्लिम है कि वह जन्म से ही मुसलमान है उनके जन्म के बाद उनके गुरु स्वामी रामानंद से युवावस्था में ही उनको हिंदू धर्म की बातें मालूम हुई लेकिन एक दिन पर रात रहते हुए कबीरदास एक पंच घाट की सीढ़ियों से गिर गए थे जब सुबह के समय रामानंद जी गंगा स्नान करने गए थे तभी उनका पैर सीढ़ियों से फिसल गया और कबीर पर पड़ गया पैर पड़ते ही उनके मन में से राम-राम शब्द का उच्चारण हुआ उसी उच्चारण को कबीर ने अपनी शिक्षा का मंत्र मान लिया था रामानंद को अपना पूर्ण गुरु मान लिया गया

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कबीर दास की मृत्यु, kabir das ki martyu

स्वामी रामानंद जी कबीर दास के प्रमुख गुरु थे तथा रामानंद जी के 12 में से कबीर दास का सर्वप्रथम नाम लिया जाता है अथवा कबीर पंथ में उनकी मृत्यु का समय सावंत 1575 विक्रम माघ शुक्ल पक्ष एकादशी को 1518 ईस्वी में हुआ था कबीर दास की मृत्यु के उपरांत उनके अंतिम संस्कार करने के लिए हिंदू और मुस्लिम लीग के दोनों संप्रदाय लोग वहां आए और उनके अंतिम संस्कार करने के लिए झगड़ने लगे लेकिन वहीं पर कबीरदास का पूर्ण शरीर की शक्ति द्वारा एक पुष्प के रूप में परिवर्तित हो जाता है जिस कारण से हिंदू तथा मुस्लिम दोनों लीग के लोगों द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया जाता है

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कबीर दास का साहित्यिक परिचय, kabir das ka sahityik parichay

संत कबीर दास को भक्ति काल एवं हिंदी साहित्य के ज्ञाना श्रेय निर्गुण भक्ति शाखा के अग्रणी संत कवि माना गया है कबीर दास के वास्तविक माता पिता का पता नहीं है कबीर दास का पालन पोषण एक झूला परिवार में हुआ था कबीरदास के गुरु रामानंद के 12 शिष्य थे जिनमें कबीर दास का सर्वप्रथम नाम लिया जाता था कबीर एक निर्गुण निराकार एकेश्वरवादी के प्रमुख उपासक थे कबीर ने जिन्हें रचनाओं की उपासना कि उन्हें बीजक कहते हैं बीजक में तीन प्रमुख रचनाएं थी जिनका नाम साक्षी, शब्द एवं रमणी जो 3 भाग में उपस्थित थी कबीर ने अपने पूरे जीवन में पाखंडी अंधविश्वासी यों एवं जातिगत भेदभाव करने वाले लोगों का खुलकर विरोध किया था कबीर द्वारा पवित्रता एवं साधु संगति का ज्ञान अर्जित कर अपने मनो में सद्गुणों को अपनाकर सदाचार का व्यवहार करना चाहिए इस पर कबीरदास ने अधिक बल दिया

समाज सुधार के पक्ष में व्यक्त हो गए कबीर अनपढ़ थे जिन्होंने अपने जीवन में स्वीकार किया।

“फेंकी मसि कागद छुओ नही कलम गई नहीं हाथ”

कबीर दास की प्रमुखता और शुद्ध पाठ तथा रचनाओं का पता लगाना बहुत ही कठिन कार्य है लेकिन फिर भी स्पष्ट है कि कबीर जो भी गाते हैं उनके प्रमुख शिष्य उनके गीत को लिख लेते थे

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कबीर दास की शिक्षा, kabir das ki shiksha

कबीर दास धीरे धीरे बड़े होने लगे थे तथा उनकी शिक्षा पूर्ण रूप से नहीं हो पाई वह एक अनपढ़ थे वह अपनी बाल्यावस्था में ही सभी बालकों से भिन्न रहते थे कबीर दास द्वारा खेल में कोई भी रुचि नहीं थी कबीर दास को मदरसे में भेजने के लिए उनके माता पिता के पास कोई भी साधन नहीं था कबीरदास को हर दिन उनके भोजन के लिए चिंता होती रहती थी कि उनके पिता के मन में कभी भी मुझे पढ़ाने का विचार भी नहीं उठा होगा यही एक कारण है जिसके कारण कबीरदास ने किताबी विद्या प्राप्त करने में असमर्थ रहे थे

”मसि कागद छुओ नहीं कलम गही नहीं हाथ”

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कबीर दास का वैवाहिक जीवन, kabir das ka vaivahik jivan

कबीर दास का विवाह एक बनखेड़ी वैरागी की पालिका कन्या “लोई” के साथ हुआ था उसके बाद कबीरदास को दो पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिनका नाम कव्वाली और कमाल नाम से था कबीर के एक ग्रंथ से यह सिद्ध होता है कि कबीर एक पुत्र उनके मत का विरोधी है

बुड्ढा बंश कबीर का, उपजा पूत कमाल
हरि का सिमरन छोडी के, घर ले आया माल ”

कबीर दास की पुत्री कमाली का उल्लेख बानिया में कहीं नहीं मिलता है लोगों का क्या जाता है कि कबीर के घर में दिन में मूल्यों का जमघट रहने से उनके बच्चों को रोटी तक मिलना कठिन हो गया था इस कारण से कबीर दास की पत्नी झुझाला उड़ती थी कबीर अपनी पत्नी को समझाते हैं की

” सुनी अंघली लोई वंपीर
इन मुडियन भजि सरन कबीर ”

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2.दूसरा गोलमेज सम्मेलन, कम्युनल अवार्ड, पूना समझौता

3.तृतीय गोलमेज सम्मेलन

4.गोलमेज सम्मेलन, गोलमेज सम्मेलन का आयोजन

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