बिहारी लाल का जीवन परिचय, bihari lal ka jivan parichay

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बिहारीलाल का जीवन परिचय, bihari ka jivan parichay

बिहारी लाल
बिहारी लाल

हिंदी साहित्य के रीति काल में बिहारी लाल का नाम भी महत्वपूर्ण है बिहारी लाल माथुर चौबे जाति के थे उनके पिता का नाम केशवराय था हिंदी साहित्य के रीति काल में बिहारी लाल का नाम भी महत्वपूर्ण है बिहारी लाल माथुर चौबे जाति के थे उनके पिता का नाम केशवराय था जयपुर के राजा जयसिंह अपनी नई रानी के सौन्दर्य और उनके प्रेम में बहुत खोए रहते थे इस कारण से वह महल से बाहर भी नहीं निकलते और राजकाज के सभी कार्यो की तरफ उनका कोई ध्यान नहीं रहता था इस कारण उनके दरबार के मंत्री गण बहुत ही परेशान रहने लगे थे लेकिन उनकी राजा को कुछ कहने की शक्ति नहीं थी इस कारण बिहारीलाल ने रात कार्ड का सभी दायित्व अपने हाथों में लेकर अपने राजा के प्रति विश्वास जताया

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली की सौ बिध्यों, आगे कौन हवाल।।

राजा ने इस दोहे को पढ़कर राजा पर मंत्र जैसा कार्य किया राजा अपनी नई पत्नी के प्रेम जाल से मुक्त होकर पुणे अपना राज कार्य में ध्यान देने लगे । राजा जयसिंह बिहारी लाल की कार्य कुशलता को देखकर अत्यंत प्रभावित एवं प्रसन्न हुए इस कारण बिहारीलाल को राजा ने अनेक दोहे को रचना के लिए कहा था और हर एक दोहे पर राजा द्वारा एक अशर्फी दी जाएगी इसका बिहारी लाल जी को राजा ने वचन दिया उसके बाद बिहारी लाल जी जयपुर के दरबार में रहकर उन्होंने अनेक काव्य रचनाए करनी शुरू की और अपने भाव लोगों तक पहुंचाने लगे इससे राजा अत्यधिक प्रसन्न हुए वहां पर रहकर उनको पर्याप्त धन और यश मिला इस कारण से बिहारीलाल का हिंदी साहित्य के जगत में नाम अमर हो गया उनके द्वारा रचित ग्रंथ मैं अनेक टिकाए हुई

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बिहारीलाल का जन्म, bihari ka janm

ग्वालियर में 1595 बिहारी लाल का जन्म हुआ था बिहारी का पूरा जीवन बुंदेलखंडनो बिता था उसके बाद उनकी युवावस्था में उनका जीवन उन के ससुराल मथुरा में बीता था उनके कार्य भाव एवं कला पक्ष दोनों ही महाकवि बिहारी लाल जी के श्रेष्ठ एवं उपयुक्त थे बिहारी लाल जी की काव्य रचनाएं रीतिकालीन काव्य में उपलब्ध है उसके बाद बिहारी ने अपने काव्य प्रेमियों के दिलों में अपनी एक बेहतर पहचान बना ली बिहारी सतसई के समाचार कल्पना की ।

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बिहारी लाल का साहित्यिक परिचय, bihari ka sahityik parichay

बिहारी जी के रचनाओं में मुख्य रूप से श्रंगार रस का उल्लेख मिलता है और उनकी रचनाओं में श्रंगार रस के दो पक्षों का समावेश मिलता है जो है संयोग और वियोग दोनों का ही सूक्ष्म रूप से उसमें वर्णन किया गया है बिहारी लाल की रचनाओं में अधिकतर वियोग का वर्णन उनकी रचनाओं में अधिक भरा हुआ है बिहारीलाल के भक्ति भावना के तरफ से भी उनके दोनों का रुका हुआ है उनकी एक प्रमुख रचना है जो बिहारी सतसई के नाम से पहचानी जाती है उसमें उन्होंने सारी बात को समाहित किया था बिहारी लाल द्वारा रचित बिहारी सतसाईं रचना लोगों के बीच आज भी प्रचलित है

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बिहारी लाल की मृत्यु, bihari ki martyu

बिहारी लाल की मृत्यु 1663 में हो गई थी बिहारीलाल ने अपने पूर्ण जीवन में सिर्फ एक ही ग्रंथ की रचना की जिसका नाम है बिहारी सत्साई जो आज भी वर्तमान में प्रचलित है उस रचना में 719 दोहे प्रचलित किया गया है । श्रंगार रस के अत्यधिक प्रसिद्ध एवं अनूठी कृति बिहारी लाल द्वारा प्रचलित सत्साईं ग्रंथ में वर्णन किया है बिहारी लाल के हर एक दोहा हिंदी साहित्य के जगत में अनूठा रतन माना जाता है बिहारीलाल द्वारा कविताएं रचित जिसमें केवल श्रंगार के बारे में ही बताया है बिहारी ने अपने सभी कविताओं में श्रृंगार के सयोग से दोहा माध्यम में इनका वर्णन किया है जो वियोग एवं संयोग हैं

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बिहारी लाल की रचनाएं, bihari ki rachnaye

हम आपको बिहारी की रचित रचनाओं के बारे में बताएंगे उन्होंने अपने पूर्ण जीवन में सिर्फ एक ही रचना की उसका नाम है बिहारी सतसई जो आज भी वर्तमान में लोगों के मध्य उपस्थित हैं

उन्होंने अपने इस रचना में 700 दोहे को प्रचलित किया बिहारीलाल के दोहे नया श्रृंगार एवं विषय भाव उपलब्ध है

उन्होंने अपने दोनों में नायिका भेद विभाव अनुभव संचारी भाव संबंधित जो उत्कृष्ट उपलब्धि की है अद्भुत है

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