महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी का युद्ध (maharana parthap, haldighati ka yudha) – My blog

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महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप

9 मई , 1540 को जन्मे महाराणा प्रताप को 1572 ई . में गोगुन्दा में राजसिंहासन पर बिठाया गया । प्रताप का राज्याभिषेक समारोह कुंभलगढ़ में आयोजित किया गया ।
राणा प्रताप आदिवासियों में कीका ( छोटा बच्चा ) के नाम से प्रसिद्ध थे ।
महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार करने को राजी करने हेतु अकबर ने सर्वप्रथम 1572 ई . को जलाल खाँ को दूत के रूप में भेजा , तत्पश्चात क्रमशः मानसिंह , भगवन्त दास तथा टोडरमल (सबसे अन्त में) को भेजा लेकिन महाराणा प्रताप अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ ।
अकबर ने राणा प्रताप को अधीन करने हेतु 2 अप्रेल , 1576 को मानसिंह के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी।

1.रावल रत्नसिंह, गोरा व बादल राजपूत सरदार (raval ratansingh, gora v badal rajput sardar)

2.महाराणा कुम्भा (maharana kumbha)

हल्दीघाटी (राजसमंद) का युद्ध haldighati rajsamand ka yudha)(21 जून, 1576 ई.)

हल्दी घाटी युद्ध के अन्य नाम मेवाड़ की थर्मोपॉली ( कर्नल टॉड )
खमनौर का युद्ध ( अबुल फजल )
गोगुन्दा का युद्ध ( बदायूँनी ) जो स्वयं उपस्थित था ।
सम्बन्धित पक्ष — राणा प्रताप व मानसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना के मध्य ।
महाराणा प्रताप जब युद्ध भूमि में मुगल सेना द्वारा घिर गये थे

तब झाला बीदा ने उनके सिर से राजकीय छत्र खींचकर अपने सिर पर धारण किया था ।

हल्दीघाटी के युद्ध में राणा प्रताप का सेनापति हकीम खाँ सूरी था ।

महाराणा उदयसिंह, महाराणा रत्नसिंह, महाराणा विक्रमादित्य (maharana udaysingh, maharana ratnsingh,) maharana vikramaditya)

कुम्भलगढ़ का युद्ध (kumbhalgad ka yudha)(1578 ई.)

सम्बन्धित पक्ष — महाराणा प्रताप व शाहबाज खाँ के मध्य ।
युद्ध के पश्चात राणा प्रताप अपने परिवार सहित चूलिया गाँव में आ बसे जहाँ प्रताप की मुलाकात अपने मंत्री भामाशाह व उनके भाई ताराचंद से हुई

जिन्होंने राणा की आर्थिक सहायता की जिससे राणा प्रताप को सेना संगठित करने में मदद मिली ।

मेवाड़ का सर्वाधिक शासन गुहिल (सिसोदिया) राजवंश (mevadh ka sarvadhik shasan guhil (sisodiya) rajvansh)

दिवेर का युद्ध (diver ka yudha)(1582 ई.)

अजमेर मेवाड़ मार्ग में स्थित महत्त्वपूर्ण चौकी दिवेर पर सुल्तान खाँ के नेतृत्व में मुगल सेना का कब्जा था । इस पर प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ी सरदारों ने धावा बोलकर सुल्तान खाँ को हराकर इस पर कब्जा कर लिया । इस युद्ध में महाराणा के पुत्र अमरसिंह ने अद्भुत साहस का परिचय दिया । कर्नल टॉड ने दिवेर के युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा है । राणा प्रताप ने लूणा राठौड़ को चावण्ड से खदेड़ कर चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया तथा यहाँ चामुण्ड ( चावण्डा ) माताजी का मंदिर बनवाया । चावण्ड में 19 जनवरी , 1597 को महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई । चावण्ड के निकट बाण्डोली नामक स्थान पर प्रताप का अंतिम संस्कार किया गया जहाँ पर आठ खंभों पर बनी महाराणा प्रताप की भव्य छतरी है ।

1.शक्तिकुमार, वैरिसिंह, विक्रमसिंह, जैत्रसिंह (shaktikumar, verisingh, vikramsingh, jetrasingh)

2.राणा हम्मीर, महाराणा मोकल, महाराणा मोकल (rana hammir, maharana mokal, maharana mokal)

3.महाराणा रायमल, महाराणा सांगा (maharana raymal, maharana sanga)

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