कवि रसखान का जीवन परिचय, raskhan ka jivan parichay कवि रसखान kavi raskhan ki kavitayen

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कवि रसखान का जीवन परिचय, raskhan ka jivan parichay

kavi raskhan ki kavitayen

कवि रसखान का जीवन परिचय (raskhan ka jivan parichay) आज हम बात करने वाले हैं पूरे भारत में प्रसिद्ध महान कवि साहित्यकार रसखान (kavi raskhan ke sahitya) की। दोस्तों रसखान के बारे में तो आपने काफी कुछ सुना होगा और कुछ पढ़ा भी होगा लेकिन इसकी कुछ खास समय था दोनों को इस पोस्ट में आपको बताना चाहेंगे। रसखान का पूरा नाम (raskhan ka pura name) सैय्यद इब्राहिम रसखान है। रसखान को हिंदी साहित्य का महान कवि माना जाता है इनकी कृष्ण भक्ति तथा रितिकालीन कविताओं में महत्वपूर्ण स्थान व योगदान रहा है रसखान के नाम (raskhan ka pura name) से ही उनको रस और खान दोनों को अलग अलग करके उनके नाम को वरीयता दी जाती हैं।

कवि रसखान कृष्ण भक्ति (raskhan ka jivan parichay) के साथ साथ काव्य में भक्ति शृंगार रस जैसे महान काव्य की रचनाएं की है कवि रसखान (raskhan ki rachna hai) निर्गुण, सद्गुण आदि भावो के साथ श्रद्धालु रहे हैं।

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कवि रसखान का जन्म, kavi raskhan ka janm

कवि रसखान के जन्म (raskhan ka jivan parichay) को लेकर कई सारे मतभेद सामने आए हैं तथा कहीं ताते भी दिए गए हैं लेकिन पूर्णता किसी भी बात पर जोर देकर यह नहीं कहा जा सकता कि कवि रसखान का जन्म (raskhan ka janm) एक निश्चित समय को प्रदर्शित करता है लेकिन कुछ विद्वानों के अनुसार बताया गया है कि कवि रसखान का जन्म (kavi raskhan ka janm) सन 1533-1558 में हुआ है। परंतु कवि रसखान (kavi raskhan) ने अपने जीवन की तरफ से कुछ जिक्र अपने सवालों में भी किया था उनके अनुसार गदर के कारण दिल्ली श्मशान बन चुकी थी और इसी कारण वह दिल्ली छोड़कर ब्रिज चले गए और यह कहानी 1590 इसवी के आसपास की थी।

इस बात से यह जाहिर होता है कि कवि रसखान (kavi raskhan) उस समय युवावस्था में रहे होंगे और विद्वानों ने यह भी बताया कि कवि रसखान का जन्म (kavi raskhan ka janm) स्थान पिहानी, हरदोई जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ लेकिन उनके जन्म स्थान को लेकर भी कई सारे विवाद उत्पन्न हुए थे कुछ का मानना था उनका का जन्म स्थान पिहानी जो दिल्ली के पास में वही हुआ।

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रसखान के साहित्य, kavi raskhan ke sahitya

कवि रसखान के साहित्य (kavi raskhan ke sahitya) सैयद इब्राहिम रसखान के सभी काव्य का आधार भगवान श्री कृष्ण को माना गया है क्योंकि रसखान के साहित्य (raskhan ke sahitya) में भगवान श्री कृष्ण की भक्ति पर ज्यादा जोर दिया है।

रसखान की कविताएं, kavi raskhan ki kavitayen

कवि रसखान की कविताएं (kavi raskhan ki kavitayen) के दो महत्वपूर्ण संग्रह अत्यधिक प्रकाशित हुए जो पूरे भारतवर्ष में प्रसारित हुए थे रसखान के महत्वपूर्ण संग्रह के नाम प्रेम वाटिका तथा सुजान रसखान है कवि रसखान की कविताएं (raskhan ki kavitayen) में ब्रज भाषा का प्रयोग करते हुए रसखान की कविता मैं अलंकार (raskhan ki kavita me alankar) उपमा उत्प्रेरक तथा रूपक अलंकार केसांचा अनुप्रास अलंकार का भी प्रयोग किया जिससे इनके कई पंक्तियों में एक सुनहरा सभा उत्पन्न होता है। रसखान (raskhan ki mrityu) के सुजान रसखान (sujan raskhan) संग्रह में 140 सर्वे प्रकाशित है और कवि रसखान (raskhan ka vyaktitva) द्वारा लिखी गई प्रेम वाटिका में 50 से ज्यादा दोहे रखे गए हैं

इन सभी दोहे और सवैये में रसखान (raskhan ki shiksha) द्वारा सौंदर्य तथा प्रेम का एक बड़ा और विचित्र निरूपण किया गया जिस कारण रसखान (raskhan ki bhasha) को एक उच्च कोटि के भक्त कवि का दर्जा दिया जाता है

आवत लाल गुलाल लिए मग सुने मिली इक नार नवीनी |
त्यों रसखानि जगाइ हिये यटू मोज कियो मन माहि अधीनी ||

सारी फटी सुकुमारी हटी, अंगिया दरकी सरकी रंग भीनी |
लाल गुलाल लगाइ के अंक रिझाइ बिदा करि दीनी ||

या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहू पुर कौ तजि डारौं |
आठहु सिद्धि नवौं निधि कौ सुख नंद की गाय चराय बिसारौं ||

रसखान‘ सदा इन नयनन्हिं सौं ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं |
कोटिन हू कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौं ||

विधु सागर रस इंदु सुभ बरस सरस रसखानि |
प्रेमवाटिका रचि रुचिर चिर-हिय-हरष बखानि ||

देखि ग़दर हित साहिबी दिल्ली नगर मसान |
छिनक बाढ़सा-बंस की ठसक छोरि रसखान ||

प्रेम निकेतन श्री बनहि आय गोवर्धन-धाम |
लह्यो सरन चित चाहिकै जुगल सरूप ललाम ||

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रसखान की पदावलीया raskhan ki padavali

रसखान ने अपनी पदावलीओं (raskhan ki padavali) में सर्वाधिक वर्णन भगवान श्री कृष्ण का क्या है लेकिन रसखान (bhakt kavi raskhan) पैसे से एक मुस्लिम कवि माने गए हैं रसखान (raskhan ke savaiye ka arth,) ने अपने जीवन काल में भगवान श्री कृष्ण को ही सर्वोपरि माना है
कवि रसखान की पदावली (raskhan ki padavali ) निम्न प्रकार है

मानुस हौं तो वही रसखान बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

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