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मध्यमिळा नगर चित्तौड़गढ़
मध्यमिळा नगर चित्तौड़गढ़

चित्तौड़गढ़ से लगभग 13 कि . मी . उत्तर में बेड़च नदी के तट पर अवस्थित नगरी पुरातात्विक महत्त्व का प्राचीन स्थल है । इसकी गणना राजस्थान के प्राचीनतम नगरों में की जाती है । साहित्यिक ग्रन्थों और शिलालेखों से पता चलता है कि इसका प्राचीन नाम ‘ मध्यमिका ‘ या ‘ मध्यमिका नगर ‘ ( मझियमिका ) था तथा यह मौर्यकाल अथवा उससे भी पहले एक समृद्धिशाली नगर था नगरी या मध्यमिका को आक्रान्त करने वाला शासक संभवतः इन्डोयूनानी शासक मिनेण्डर था

जिसके कुछ सिक्के यहाँ से प्राप्त हुए हैं ।

जनपदकाल में नगरी और उसका समीपवर्ती प्रदेश शिवि जनपद के अंतर्गत आता था ।

यहाँ से उपलब्ध मुद्राओं पर उत्कीर्ण ‘ मज्झममिकया शिवि जनपदस्स ‘ से इस तथ्य की पुष्टि होती है ।

वराहमिहिर ( छटी शताब्दी ई . ) तथा जैन कवि सोमदेव दसवीं शताब्दी ई . ) ने इस प्राचीन नगर के वैभव का वर्णन किया है । इतिहासकारों की धारणा है कि मौर्य राजा चित्रंग ( चित्रांगद ) द्वारा सातवीं शताब्दी ई . के लगभग चित्रकोट ( चित्तौड़ ) की स्थापना से पूर्व नगरी उसकी राजधानी थी ।

नगरी जैन धर्म और संस्कृति का भी एक प्रमुख केन्द्र था ।

जैनों की मझमिका उपशाखा का उद्भव यहीं से माना जाता है ।

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सलूम्बर नगर उदयपुर, salumbar nagar udaypur

राजस्थान के उदयपुर शहर से 70 कि . मी . दूर दक्षिण में बांसवाड़ा मार्ग पर ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व वाला नगर सलूम्बर स्थित है ।मेवाड़ के उमरावों में सलूम्बर प्रथम श्रेणी का ठिकाना रहा तथा मेवाड़ में इसका प्रमुख स्थान रहा । ठिकाने के शासक रावत पदवी से सम्मानित रहे । मेवाड़ के पट्टे , परवानों , ताम्रपत्र एवं सनदों पर महाराणा की सही के ऊपर भाले निशान का अंकन इन्हीं पाटवी चुंडावतों द्वारा होता रहा ।

हाड़ी रानी द्वारा शीश काटकर भेजने की शौर्य गाथा , रावत जैतसिंह चुंडावत का उठाला किला ( वल्लभनगर ) फतह करना और बलिदान देकर हरावल के हक को कायम रखना , रावत केसरीसिंह प्रथम द्वारा दिल्ली के तत्कालीन बादशाह औरंगजेब के सामने शेर को चीरना इत्यादि कई गौरव गाथाएँ सलूम्बर की वीरप्रसूता धरा अपने अंक ( गोद ) में समेटे हुए है । प्राचीन शहरकोट में आठ दरवाजे है यथा सूरजपोल , चांदपोल , किशनपोल ( ध्वस्त ) , बिलों का दरवाजा , घाटी दरवाजा , पाल दरवाजा , भीमगढ़ दरवाजा एवं तुर्की दरवाजा – चारों दिशाओं बने हुए है ।

नगर में कई प्राचीन मंदिर हैं

जिनमें बैजनाथ महादेव , सोनार माता , द्वारकाधीश , चार भुजा , जगदीशजी और बद्रीनाथ के मंदिर प्रमुख हैं ।

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